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133वां राष्ट्रीय दशहरा मेला 2026: प्रभु श्रीराम की स्तुति और भक्तिमय सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से गुंजायमान हुआ मेला प्रांगण

2 days ago

133वां राष्ट्रीय दशहरा मेला 2026: प्रभु श्रीराम की स्तुति और भक्तिमय सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से गुंजायमान हुआ मेला प्रांगण

 

बरखा जोशी और ग्रुप के कलाकारों ने 'राम रसधार' एवं संगीतमय नृत्य प्रस्तुतियों से बांधा समां

 

श्री राम स्तुति' से 'महारास' तक: भक्ति रस में सराबोर हुए श्रद्धालु

 

कोटा। 133वें राष्ट्रीय दशहरा मेला 2026 का रंगारंग एवं भव्य आगाज प्रभु श्रीराम की आराधना और भक्ति भाव से ओत-प्रोत सांस्कृतिक संध्या के साथ हुआ। मेला परिसर स्थित श्रीराम रंगमंच पर आयोजित 'राम रसधार एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम' के अंतर्गत इस संध्या में पूरा मेला प्रांगण भगवान श्री राम के जयकारों और मधुर भक्तिमय धुनों से सराबोर हो उठा। 

 

कार्यक्रम का शुभारंभ भारतीय परंपरा के अनुसार ऋद्धि-सिद्धि के दाता भगवान श्री गणेश की वंदना से किया गया। इसके पश्चात मंच पर कला, संस्कृति और भक्ति का अनूठा संगम देखने को मिला। प्रख्यात कलाकार बरखा जोशी एवं उनके ग्रुप के प्रतिभावान कलाकारों ने राम भक्ति पर आधारित एक से बढ़कर एक मनमोहक प्रस्तुतियां देकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

 

सांस्कृतिक संध्या का मुख्य आकर्षण प्रभु श्रीराम की स्तुति पर आधारित विशेष नृत्य नाटिका रही। कलाकारों ने 'श्री रामचंद्र कृपालु भजमन' की लय पर अत्यंत जीवंत 'श्री रामचंद्र नृत्य' प्रस्तुत कर प्रांगण में उपस्थित प्रत्येक श्रद्धालु को भावविभोर कर दिया। तत्पश्चात, शास्त्रीय और लोक कला के रंगों को समेटते हुए 'अलबेला सजन आयो रे...' गीत पर दी गई शानदार समूह नृत्य प्रस्तुति ने दर्शकों को तालियां बजाने पर मजबूर कर दिया।

कार्यक्रम में एकल नृत्य की प्रस्तुतियों ने भी दर्शकों का ध्यान विशेष रूप से आकर्षित किया। बरखा जोशी की 'रघुवर तेरी राह निहारे...' और 'रघु प्रीत...' जैसे भजनों पर दी गई एकल नृत्यों में कलाकारों की भाव-भंगिमाएं, शारीरिक अभिव्यक्ति और समर्पण देखते ही बन रहा था। इसके उपरांत, भक्ति रस को और अधिक प्रगाढ़ करते हुए 'हनुमान लाला' की विशेष प्रस्तुति दी गई।

 

संध्या का सबसे अलौकिक और मनमोहक क्षण श्रीकृष्ण लीला पर आधारित भव्य 'महारास' की प्रस्तुति रही। पारंपरिक परिधानों में सजे कलाकारों ने जब मंच पर भगवान श्री कृष्ण और गोपियों के निश्छल प्रेमानंद तथा रासलीला के प्रसंगों को सजीव किया, तो पूरा प्रांगण कृष्ण भक्ति के रंग में रंग गया। कलाकारों के तालबद्ध चरणों की चाप, सुमधुर संगीत और भावपूर्ण अभिनय ने द्वापर युग के वृंदावन के दृश्य को जीवंत कर दिया। इस महारास की अलौकिक प्रस्तुति ने दर्शकों को अध्यात्म और आनंद की एक नई अनुभूति से भर दिया।

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