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डूंगरपुर सभापति चुनाव में सुशीला गुप्ता को भाजपा का टिकट:प्रभु पंड्या निर्दलीय प्रत्याशी बने, बहुमत के बावजूद बढ़ी खींचतान

3 weeks ago

डूंगरपुर नगर परिषद सभापति पद को लेकर भाजपा में चल रहा सस्पेंस गुरुवार को खत्म हो गया। भाजपा ने पूर्व सभापति एवं स्वच्छता ब्रांड एम्बेसेडर केके गुप्ता की पत्नी सुशीला गुप्ता को अधिकृत प्रत्याशी बनाया है। वहीं, पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष प्रभु पंड्या को पार्टी का सिंबल नहीं मिलने से वे अब निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में हैं। नगर परिषद में भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत होने के बावजूद पंड्या के निर्दलीय मैदान में रहने से पार्टी के भीतर खींचतान की स्थिति बन गई है। बंद लिफाफे ने बनाए रखा सस्पेंस सभापति पद के लिए भाजपा से प्रभु पंड्या और सुशीला गुप्ता ने नामांकन दाखिल किया था। दोनों ने पार्टी और संगठन के आदेश पर नामांकन भरने का दावा किया था। बुधवार को भाजपा के सह संगठन प्रभारी ने करीब 2.30 बजे निर्वाचन अधिकारी को पार्टी का सिंबल बंद लिफाफे में सौंप दिया, लेकिन अधिकृत प्रत्याशी के नाम की घोषणा नहीं की गई। इसके बाद पूरे दिन भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी को लेकर सस्पेंस बना रहा। शाम करीब 3 बजे निर्वाचन विभाग ने भी सूचना बोर्ड पर भाजपा के दो और कांग्रेस के एक नामांकन की जानकारी चस्पा की। इसके बाद गुरुवार को नामांकन पत्रों की जांच के दौरान बंद लिफाफा खोला गया और सुशीला गुप्ता को भाजपा का अधिकृत प्रत्याशी घोषित किया गया। सिंबल नहीं मिलने के कारण प्रभु पंड्या निर्दलीय प्रत्याशी हो गए। भाजपा के पास बहुमत से ज्यादा पार्षद डूंगरपुर नगर परिषद में कुल 40 वार्ड हैं। इनमें भाजपा ने दो निर्विरोध समेत 24 वार्डों में जीत दर्ज की है। इसके अलावा वार्ड 31 से भाजपा से बागी होकर निर्दलीय चुनाव जीते सुनील जैन ने भी भाजपा को समर्थन दिया है। ऐसे में भाजपा के पास सभापति बनाने के लिए पर्याप्त संख्या है। हालांकि, प्रभु पंड्या ने अपना नामांकन वापस नहीं लिया तो भाजपा के सामने अपने ही खेमे से निकले निर्दलीय प्रत्याशी की चुनौती रहेगी। ऐसे में बहुमत होने के बावजूद सभापति चुनाव में पार्टी के अंदरूनी समीकरण महत्वपूर्ण हो सकते हैं। कांग्रेस-बीएपी मिलकर भी बहुमत से दूर सभापति पद के लिए कांग्रेस की ओर से भरत नागदा ने नामांकन दाखिल किया है। डूंगरपुर निकाय में कांग्रेस के 12 पार्षद हैं, जबकि बीएपी के पास 3 पार्षद हैं। दोनों दलों के आंकड़े को जोड़ने पर भी संख्या 15 ही होती है। इसलिए सभापति पद के चुनाव में भाजपा के बहुमत को चुनौती देने के लिए कांग्रेस और बीएपी के पास पर्याप्त संख्या नहीं है। केके गुप्ता के अनुभव का सुशीला को मिला फायदा सुशीला गुप्ता पूर्व सभापति और प्रदेश में स्वच्छता ब्रांड एम्बेसेडर रहे केके गुप्ता की पत्नी हैं। सुशीला गुप्ता पार्टी में सक्रिय चेहरा नहीं रही हैं, लेकिन केके गुप्ता के नगर परिषद के पूर्व सभापति के रूप में अनुभव को उनके टिकट के पीछे अहम माना जा रहा है। केके गुप्ता के कार्यकाल में डूंगरपुर नगर परिषद को स्वच्छता के क्षेत्र में देशभर में कई पुरस्कार मिले थे। छोटे शहरों की श्रेणी में डूंगरपुर नगर परिषद लगातार पांच साल तक शीर्ष पर रहा। ऐसे में स्वच्छता के क्षेत्र में गुप्ता की पहचान और नगर परिषद का अनुभव सुशीला गुप्ता के पक्ष में महत्वपूर्ण रहा। 40 साल का संगठनात्मक अनुभव, फिर भी पंड्या को टिकट नहीं प्रभु पंड्या करीब 40 वर्षों से भाजपा और संगठन से जुड़े हुए हैं। वे भाजपा युवा मोर्चा जिलाध्यक्ष, जिला महामंत्री, जिलाध्यक्ष, किसान मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष और भाजपा प्रदेश कार्यसमिति सदस्य जैसे पदों पर रह चुके हैं। आरएसएस से उनके जुड़ाव के कारण भी संगठन में उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती रही है। सभापति पद के लिए उनका नाम मजबूत दावेदारों में माना जा रहा था। लेकिन पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के रूप में सुशीला गुप्ता के नाम की घोषणा के बाद अब पंड्या निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव मैदान में हैं। ऐसे में डूंगरपुर नगर परिषद का सभापति चुनाव भाजपा के स्पष्ट बहुमत के बावजूद पार्टी के अंदरूनी समीकरणों के लिहाज से खासा दिलचस्प हो गया है।
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