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कांग्रेस को 42 सीटें और भाजपा को 27 सीटें मिली:हिट विकेट हुई भाजपा; तीसरी बार निगम जीतने की हैट्रिक से चूकी

जिले के स्थानीय निकाय चुनावों में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को भारी झटका लगा है। नगर निगम के साथ-साथ जिले की छह नगर पालिकाओं में भी भाजपा का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। नगर निगम में कांग्रेस ने पूर्ण बहुमत हासिल कर बोर्ड पर कब्जा जमा लिया है जबकि छह में से चार पालिकाओं में भाजपा को सत्ता गंवानी पड़ी है। नगर निगम के 80 वार्डों के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 42 सीटों पर जीत दर्ज कर स्पष्ट बहुमत हासिल किया है। वहीं भाजपा 27 सीटों पर सिमट कर रह गई। रालोपा को 1 और 10 निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है। दिग्गजों के वार्डों में हारी भाजपा: बीकानेर पूर्व विधायक सिद्धि कुमारी के वार्ड 14 से पूर्व मेयर सुशीला कंवर राजपुरोहित चुनाव हार गईं। हालांकि केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल के मूल वार्ड 6 और पश्चिम विधायक जेठानंद व्यास के मूल वार्ड 59 में भाजपा ने जीत दर्ज की लेकिन शहर भाजपा अध्यक्ष सुमन छाजेड़ के वार्ड 47 में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। नगर पालिका : देशनोक में कांग्रेस, लूणकरणसर-खाजूवाला में भाजपा लूणकरणसर (35 वार्ड): भाजपा ने 23 सीटों पर जीत दर्ज की। कांग्रेस को 11 और एक निर्दलीय को जीत मिली। खाजूवाला (20 वार्ड): भाजपा ने 11 सीटों के साथ बहुमत का आंकड़ा छुआ, जबकि कांग्रेस को 8 और एक निर्दलीय को जीत मिली। देशनोक (25 वार्ड): कांग्रेस ने 15 सीटों पर कब्जा जमाया और पूर्ण बहुमत हासिल किया। भाजपा मात्र 7 जबकि 3 सीटों पर निर्दलीय जीते। नोखा (45 वार्ड): यहाँ सीपीआई (एम) समर्थित विकास मंच ने 29 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत हासिल किया। भाजपा यहां 13 और निर्दलीय 3 सीटों पर सिमट गए। श्रीडूंगरगढ़ (40 वार्ड): यहां किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। कांग्रेस 15 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है, जबकि भाजपा को 13, विकास मंच को 9, सीपीआई (एम) को 1 और 2 निर्दलियों को जीत मिली है। नापासर (25 वार्ड): यहां त्रिशंकु जैसी स्थिति रही, जिसमें भाजपा ने 10 वार्डों में जीत दर्ज की, वहीं कांग्रेस को 7, निर्दलियों को 6 और आरएलपी को 2 सीटों पर सफलता मिली। बीकानेर पूर्व: भाजपा का पारंपरिक गढ़ और कांग्रेस की सेंधमारी पूर्व विधानसभा सीट पर भाजपा का मजबूत आधार एक बार फिर नजर आया। भाजपा ने यहां सामान्य वर्ग की 11 और सामान्य महिला वर्ग की 2 सीटों पर जीत दर्ज की, जो इस क्षेत्र में उसके पारंपरिक जनाधार को पुख्ता करती है। हालांकि भाजपा को ओबीसी (एक पुरुष, एक महिला) और एससी वर्ग (एक पुरुष, एक महिला) से सफलता मिली। कांग्रेस ने सामान्य वर्ग की 7 और सामान्य महिला वर्ग की 4 सीटों के साथ सवर्ण मतदाताओं में अपनी पैठ मजबूत की। सबसे बड़ा उलटफेर ओबीसी और एससी वर्ग के मोर्चे पर रहा जहां कांग्रेस ने ओबीसी की 5 और एससी की 3 सीटों पर कब्जा जमाया। कांग्रेस ने केवल सामान्य सीटों पर ही नहीं, बल्कि आरक्षित और अन्य पिछड़ा वर्ग के बीच भी भाजपा की तुलना में कहीं अधिक सीटें जीतकर अपनी सियासी जमीन को व्यापक किया है। बीकानेर पश्चिम: कांग्रेस का आक्रामक विस्तार पश्चिम विधानसभा क्षेत्र के परिणाम कांग्रेस के पक्ष में निर्णायक रहे। यहां कांग्रेस ने सामान्य वर्ग की 11 और सामान्य महिला वर्ग की 6 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। इसके अलावा ओबीसी पुरुष (2), ओबीसी महिला (1), एससी पुरुष (1) और एससी महिला (2) पदों पर जीत हासिल कर पार्टी ने सर्वस्पर्शी जीत का संदेश दिया। दूसरी ओर पश्चिम में भाजपा का प्रदर्शन मुख्य रूप से सामान्य सीटों (4 सामान्य, 3 सामान्य महिला) तक सिमट कर रह गया। ओबीसी (एक पुरुष, एक महिला) और एससी (1) वर्ग में भाजपा को सीमित सीटें ही मिल सकीं। लब्बोलुआब यह है कि इस चुनाव में कांग्रेस ने रणनीति बदलते हुए न केवल सामान्य सीटों पर फोकस किया बल्कि ओबीसी और एससी वर्ग के मतदाताओं को भी मजबूती से अपने पाले में खींचा।

भाजपा के सामने समीकरण साधने की चुनौती, किसे मिलेगा ताज?:दिग्गज पार्षदों ने खटखटाने शुरू किए शीर्ष नेतृत्व के दरवाजे, पैरवी तेज

निगम चुनाव में भाजपा 80 में से 53 वार्डों में बंपर जीत दर्ज कर चुकी है। अब शहर का प्रथम नागरिक यानी मेयर और डिप्टी मेयर चुनने की कवायद तेज हो गई है। रेस में शामिल सभी विजेता पार्षदों ने शीर्ष नेतृत्व के दरवाजे खटखटाने शुरू कर दिए हैं। इस कुर्सी के लिए प्रमोद सामर, दिनेश भट्ट, पारस सिंघवी, अतुल चंडालिया, महेंद्र सिंह शेखावत, यशवंत आंचलिया, आकाश वागरेचा के बीच कड़ा मुकाबला है। इनमें भी सामर, भट्ट, चंडालिया का पलड़ा सबसे भारी माना जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी के भीतर सामर को मेयर और भट्ट को डिप्टी मेयर या भट्ट को मेयर व चंडालिया को डिप्टी मेयर बनाने का अंदरूनी मंथन चल रहा है। पार्टी के पास ब्राह्मण, जैन, क्षत्रीय सहित अन्य समाजों के चेहरों को साधने की चुनौती है। पूर्व डिप्टी मेयर पारस सिंघवी बाड़ेबंदी के जरिए संख्या बल जुटा रहे हैं। वहीं प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ के रिश्तेदार पंकज बोराणा भी डिप्टी मेयर पद पर दावेदारी ठोक रहे हैं। कांग्रेस में फिर नेता प्रतिपक्ष की सुगबुगाहट कांग्रेस के खाते में 23 सीटें आई हैं। भाजपा का बोर्ड बनना तय होने के बाद अब कांग्रेस खेमे में नेता प्रतिपक्ष के चेहरे को लेकर सुगबुगाहट बढ़ गई है। कांग्रेस के कई दिग्गज चेहरे जीतकर आए हैं। शहर जिलाध्यक्ष फतेहसिंह राठौड़ की पत्नी पूनम कंवर, पूर्व केंद्रीय मंत्री दिवंगत डॉ. गिरिजा व्यास के भाई की बहू हितांशी शर्मा, अरुण टांक और शंकर चंदेल ने जीत हासिल की है। पार्टी इन बड़े चेहरों में से किसी एक को नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी दे सकती है। पूनम कंवर और हितांशी शर्मा के नाम सबसे आगे चल रहे हैं। हालांकि, साल 2019 के चुनाव में कांग्रेस ने 70 में से 20 सीटें जीती थीं, लेकिन आपसी विवाद के बीच पांच साल तक नेता प्रतिपक्ष तक नहीं बना पाई थी। भाजपा के शहर विधायक ताराचंद जैन और जिलाध्यक्ष गजपाल सिंह राठौड़ के अलावा प्रदेश उपाध्यक्ष अलका मूंदड़ा, संघ के पदाधिकारी और कई केंद्रीय मंत्री अपने पसंदीदा नामों की जयपुर से दिल्ली तक पैरवी कर रहे हैं।

अब मिशन मेयर; कोठारी-कर्णावट आगे, दिल्ली तक लॉबिंग:वैश्य समाज से मोहनलाल गुप्ता, निर्मल नाहटा व अशोक परनामी मेयर रह चुके

नगर निगम चुनाव परिणाम का सीन सोमवार दोपहर साफ होते ही भाजपा में मेयर कुर्सी की जंग शुरू हो गई। पार्टी में मेयर के नाम को लेकर लॉबिंग तेज हो गई है। चुनाव परिणाम आने से पहले ही जिन नामों की चर्चा थी, उनमें अब जीतकर आए चेहरे सबसे आगे हैं। जयपुर से लेकर दिल्ली तक संपर्क साधे जा रहे हैं और संगठन से लेकर समाज तक की लॉबियां सक्रिय हो गई हैं। खास बात यह है कि अब तक मेयर के लिए वैश्य समाज ही दावा कर रहा था, लेकिन अब ब्राह्मण समाज ने भी लॉबिंग शुरू कर दी है, क्योंकि वैश्य व जैन समाज से तीन मेयर रह चुके हैं, जबकि ब्राह्मण समाज से भाजपा ने अब तक एक बार भी मेयर नहीं बनाया। राजपूत समाज से भी कोई मेयर नहीं मिला। यूजीसी को लेकर सबसे ज्यादा नाराजगी राजपूत समाज में ही है। हालांकि चार वार्डों में री-पोलिंग होने से फिलहाल मेयर का चुनाव टाल दिया गया है। सबसे ज्यादा चर्चा वार्ड-112 से जीते सुनील कोठारी की है पूर्व भाजपा शहर अध्यक्ष और संगठन में कई जिम्मेदारियां संभाल चुके कोठारी को चुनाव से पहले ही मेयर पद का मजबूत चेहरा माना जा रहा था। इन्हें संभावित दावेदारों में सबसे आगे बताया था। दूसरा बड़ा नाम वार्ड-76 से जीते पूर्व डिप्टी मेयर पुनीत कर्णावट का है। कर्णावट के पास निगम चलाने का पिछला अनुभव है। वैश्य चेहरे कई, समाज का दावा मजबूत भाजपा में वैश्य समाज से कई मजबूत चेहरे जीतकर आए हैं। वार्ड-98 के सुभाष सिंघी, वार्ड-135 के विमल अग्रवाल और वार्ड-121 के नीरज अग्रवाल भी मेयर की संभावित सूची में चर्चा में हैं। भाजपा की सूची जारी होने के समय भी विमल अग्रवाल और अन्य वैश्य नेताओं की मौजूदगी को मेयर पद के सामाजिक समीकरण से जोड़कर देखा गया था। वैश्य समाज का दूसरा चेहरा वार्ड-98 से जीते सुभाष सिंघी हैं। इन्होंने कांग्रेस के राजकुमार को 400 वोटों से हराया है। पहली बार राजपूत समाज की दावेदारी विद्याधर नगर के वार्ड-14 से जीते दिग्विजय सिंह को भी दावेदार माना जा रहा है। इनकी पत्नी दुर्गेश नंदनी भी दो बार पार्षद रह चुकी हैं। ब्राह्मण दावेदारी का दबाव ब्राह्मण समाज से पूर्व जयपुर शहर अध्यक्ष शैलेंद्र भार्गव का नाम प्रमुख है। वे वार्ड-43 से जीतकर आए हैं। भाजपा ने उन्हें महत्वपूर्ण पुराने राजनीतिक क्षेत्र से मैदान उतारा था। ब्राह्मण समाज से सिर्फ विष्णु लाटा ही उलटफेर में मेयर बने थे, जो 11 महीने तक मेयर रहे। इस बार फैसला सिर्फ जातीय समीकरण से नहीं जयपुर में खंडेलवाल समाज से मोहनलाल गुप्ता, जैन समाज से निर्मल नाहटा और माहेश्वरी समाज से अशोक लाहोटी मेयर रह चुके हैं, इसलिए इस बार ब्राह्मण समाज की दावेदारी को भी पार्टी के भीतर वजन मिल रहा है। लेकिन अंतिम फैसला केवल जातीय समीकरण से नहीं होगा। किसके साथ कितने पार्षद हैं, संगठन में पकड़ कितनी है, सरकार और प्रदेश नेतृत्व किसके साथ है और दिल्ली की पसंद क्या है... ये सभी समीकरण निर्णायक होंगे।

बीकानेर नगर निगम चुनाव परिणाम:सामान्य सीटों पर ओबीसी को टिकट देना भाजपा को पड़ा भारी, 16 में से 10 वार्ड हारी

बीकानेर के राजनीतिक रण में इस बार दलों की टिकट वितरण नीति ने चुनावी नतीजों की पूरी तस्वीर बदल दी है। कांग्रेस की तुलना में भाजपा से सामान्य वर्ग को ज्यादा उम्मीदें थीं क्योंकि कांग्रेस अपनी पारंपरिक रणनीति के तहत सामान्य सीटों पर मुस्लिम और ओबीसी उम्मीदवारों को उतारती रही है। हालांकि इस बार जब भाजपा ने भी सामान्य सीटों पर ओबीसी चेहरों पर दांव खेला तो पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ा। पूर्व विधानसभा क्षेत्र में भाजपा ने 8 सामान्य सीटों पर ओबीसी उम्मीदवार मैदान में उतारे, जिसका खामियाजा पार्टी को 4 सीटों पर हार कर भुगतना पड़ा। यही स्थिति बीकानेर पश्चिम में भी देखने को मिली जहां 8 सामान्य सीटों पर 2 मुस्लिम और 6 ओबीसी वर्ग के उम्मीदवारों को टिकट दिए गए। नतीजतन भाजपा को इस क्षेत्र की 6 सीटों पर पराजय झेलनी पड़ी। साफ है कि सामान्य वर्ग के मतदाताओं ने अपनी सीटों पर अन्य वर्गों को उम्मीदवार बनाए जाने पर खुलकर नाराजगी जाहिर की जिसने दोनों ही दलों के सियासी समीकरणों को हिलाकर रख दिया। ये प्रयोग बाहर से आए भाजपा के प्रभारी जो खुद ओबीसी वर्ग से आते हैं उनका है और भाजपा को मुंह की खानी पड़ी।

जमकर बरसे कमल और बादल...:नगर निगम में 7वीं बार भाजपा का बोर्ड, 80 में से 53 वार्ड जीते

नगर निगम चुनाव के सभी 80 वार्डों के आधिकारिक परिणाम घोषित हो चुके हैं। भारतीय जनता पार्टी ने 53 सीटों पर एकतरफा जीत हासिल कर लगातार 7वीं बार नगर निकाय में अपना बोर्ड बनाना तय कर लिया है। चुनाव में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को 23 सीटों से ही संतोष करना पड़ा, जबकि 3 सीटों पर निर्दलीयों और 1 सीट पर सीपीएम ने जीत दर्ज की। दैनिक भास्कर ने 12 सितंबर के अंक में ही आकलन प्रकाशित कर दिया था कि भाजपा 48 से 56 और कांग्रेस 18 से 24 सीटों पर जीत दर्ज करेगी, जो सटीक साबित हुआ। भले ही भारत आदिवासी पार्टी (बीएपी) खाता न खोल सकी हो, लेकिन उसने वार्ड 10 और 12 में भाजपा को सीधी टक्कर देकर दूसरा स्थान हासिल किया। चाय-ऑटो वाले से लेकर डॉक्टर, सीए, पूर्व छात्र नेताओं ने जीतकर और सिद्धार्थ ने हारकर चौंकाया वार्ड 54 से भाजपा के ऑटो ड्राइवर मिथुन दा नाम से मशहूर राजेंद्र गखरेजा ने निर्दलीय देवेंद्र माली को हराया; इनके लिए जनजाति मंत्री बाबूलाल खराड़ी भी गए थे। शिक्षित चेहरों में पीएचडी धारक कांग्रेस की डॉ. हितांशी शर्मा, डॉ. पूनम राठौड़ और भाजपा की डॉ. कविता जोशी, डॉ. पंकज बोराणा जीते। भाजपा के सीए आशीष कोठारी व कांग्रेस की एमबीबीएस डॉ. खुशी गमेती विजयी रहीं। छात्र राजनीति व युवा संगठनों से प्रमोद सामर, पारस सिंघवी, महेंद्र सिंह शेखावत, डॉ. पंकज बोराणा, किशन भील व हर्षवर्धन केलावत ने बाजी मारी। संगठन नेताओं में भाजपा मंडल अध्यक्ष प्रताप सिंह राठौड़, विजय आहूजा, महेशपुरी गोस्वामी, कांग्रेस ब्लॉक अध्यक्ष शंकर चंदेल और पूर्व मेयर प्रत्याशी अरुण टांक भी जीते। वहीं, एनएसयूआई पदाधिकारी सिद्धार्थ सोनी ने वार्ड 14 से चुनाव हारकर चौंका दिया। दिग्गजों के गृह वार्डों का हाल शहर विधायक ताराचंद जैन के गृह वार्ड 34 में भाजपा की अलका गुर्जर ने जीत दर्ज की। हालांकि, ग्रामीण विधायक फूल सिंह मीणा के गृह वार्ड 60 में बड़ा उलटफेर हुआ; यहाँ भाजपा की बागी निर्दलीय खुशबू मेहता (1,852 मत) ने भाजपा की आधिकारिक प्रत्याशी सुषमा को 694 वोटों से शिकस्त दी। इसी तरह वार्ड 61 से निर्दलीय इंदिरा डांगी और वार्ड 11 से निर्दलीय कमलेश बोराणा ने जीत हासिल की। शपथ ग्रहण और बाड़ेबंदी: नतीजों के तुरंत बाद भाजपा के सभी 53 नवनिर्वाचित पार्षदों को कड़ी सुरक्षा के बीच बस से सीधे मतगणना स्थल आरसीए लाया गया। परिजनों से संक्षिप्त मुलाकात के बाद शाम 4 बजे सभी को प्रमाण-पत्र देकर शपथ दिलाई गई। इससे पहले कांग्रेस के 23 पार्षदों ने शपथ ली। पूरे प्रदेश में उदयपुर में भाजपा की सबसे बड़ी जीत, 80 में 53 सीटें यानी 66.25% पर कब्जा राजस्थान के प्रमुख शहरों के निकाय चुनाव परिणामों में उदयपुर में भाजपा का प्रदर्शन सबसे मजबूत रहा। यहां पार्टी ने कुल 80 सीटों में से 53 पर जीत दर्ज की, यानी 66.25% सीटें भाजपा के खाते में गईं। भाजपा की जीत के 4 बड़े कारण दिग्गजों को मैदान में उतारना : विधानसभा चुनाव में दावेदारी करने वाले 7 बड़े चेहरों को पार्षद चुनाव में उतारकर पार्टी ने माहौल अपने पक्ष में मोड़ा। सीएम का रोड शो व ध्रुवीकरण : मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के रोड शो ने कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरी। वहीं, खांजीपीर-आयड़ और कन्हैयालाल हत्याकांड के मुद्दों के उठने से मतों का सीधा ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में हुआ। सॉलिड कोर वोट बैंक व एकजुटता : टिकट वितरण में कोर वोट बैंक को साधे रखा गया। सीएम ने शहर विधायक, ग्रामीण विधायक और जिलाध्यक्ष के बीच बेहतर तालमेल बिठाए रखा। माइक्रो-मैनेजमेंट : भीतरघात की आशंका के बीच नेताओं ने अपनी-अपनी सीटें बचाने में पूरी ताकत झोंकी, जिससे 100 से कम अंतर वाले 5 नजदीकी मुकाबलों में से अधिकांश भाजपा की झोली में गिरे। कांग्रेस की हार के 4 बड़े कारण स्टार प्रचारकों की अनुपस्थिति : सीएम भजनलाल के रोड शो की काट के लिए प्रदेश का कोई बड़ा कांग्रेसी चेहरा उदयपुर प्रचार में नहीं उतरा, जिससे कार्यकर्ताओं में असमंजस बना रहा। बड़े चेहरों से दूरी: विधानसभा टिकट के दावेदार बड़े नेताओं को चुनाव मैदान में नहीं उतारा गया, जिससे भाजपा की तुलना में कांग्रेस का प्रचार फीका नजर आया। टिकट वितरण पर असंतोष : 80 में से 20 टिकटों पर भयंकर विरोध हुआ। ऐन वक्त पर 3 प्रत्याशी बदले गए, जिससे संगठन का ढांचा कमजोर हुआ। केंद्रीय नेतृत्व नहीं : केवल शहर जिलाध्यक्ष और देहात जिलाध्यक्ष ही धरातल पर संघर्ष करते दिखे। अन्य बड़े नेता सिर्फ अपने चहेतों को साधने में जुटे रहे, जिसके चलते 100 से कम अंतर वाली 5 सीटें कांग्रेस के हाथ से फिसल गईं।

नगर निगम चुनाव परिणाम:ईवीएम खराब; वार्ड 9,18,25 और 34 के 5 बूथों पर कल पुनर्मतदान

नगर निगम चुनावों की मतगणना के दौरान 4 वार्डों के 5 बूथों की ईवीएम में आई तकनीकी खराबी के चलते पुनर्मतदान करवाए जाएंगे। जिन बूथों पर तकनीकी कारणों से मतों का परिणाम प्रदर्शित नहीं हो सका और अप्रदर्शित मतों की संख्या निकटतम प्रतिद्वंद्वी के हार-जीत के अंतर से अधिक है, वहां आयोग ने राजस्थान नगर पालिका (निर्वाचन) नियम, 1994 के नियम 55 के तहत मतदान को शून्य घोषित कर दिया है। नगर निगम जयपुर के वार्ड-9 के बूथ 111, वार्ड-18 के बूथ 235, वार्ड-25 के बूथ 343 और वार्ड-34 के बूथ 477 व 484 पर चुनाव आयोग के विशेष दिशा-निर्देश पर पुनर्मतदान होगा। मतदाताओं की पहचान सुनिश्चित करने के लिए उनके बाएं हाथ की मध्यमा पर अमिट स्याही लगाई जाएगी। पुनर्मतदान 16 सितंबर को सुबह 7 से शाम 6 बजे तक होगा। मतगणना 17 सितंबर को सुबह 8 बजे होगी। मेयर-डिप्टी मेयर चुनाव टले राज्य निर्वाचन आयोग ने आगामी आदेश तक मेयर और डिप्टी मेयर के चुनाव स्थगित कर दिए। 15 सितंबर को मेयर और 22 सितंबर को डिप्टी मेयर का चुनाव होना था। सभी 150 वार्ड के अंतिम परिणाम घोषित नहीं होने से दोनों चुनाव आगामी आदेश तक स्थगित कर दिए गए हैं।

निर्दलीयों को साधने में लगी भाजपा-कांग्रेस:जैसलमेर पहुंचे कांग्रेस के 42 पार्षद, जोधपुर में होटल बदलकर सेंधमारी में जुटी भाजपा

नगर निगम चुनाव के परिणाम आने के बाद राजनीतिक उठापटक और जोड़-तोड़ की सियासत तेज हो गई है। पूर्ण बहुमत हासिल करने के बावजूद कांग्रेस पार्टी किसी भी तरह का जोखिम लेने के मूड में नहीं है। कांग्रेस ने शाम को अपने सभी 42 जीते हुए पार्षदों और 3 निर्दलीय समर्थकों को बसों में बैठाकर सीधे जैसलमेर की ओर रुख किया। कांग्रेस खेमे से मिली जानकारी के मुताबिक चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद पार्टी ने बिना किसी को भनक लगे अपने पार्षदों को सुरक्षित ठिकानों पर भेजने का प्लान तैयार किया। शाम करीब 8 बजे अचानक पार्षदों को एकजुट किया गया और गोपनीय तरीके से रवाना कर दिया गया। एहतियात के तौर पर सभी विजयी पार्षदों को सफर के दौरान बस में ही खाना दिया गया। साथ ही किसी भी प्रकार के बाहरी संपर्क या आंतरिक लीक से बचने के लिए अधिकांश पार्षदों के मोबाइल फोन भी जमा करवा लिए गए हैं। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने भी अपनी रणनीति बदल दी है। भाजपा ने अपने पार्षदों को जोधपुर में ही ठहराए रखने का फैसला किया है, हालांकि सुरक्षा और आंतरिक समीकरणों के चलते पार्टी ने अपना ठहरने वाला होटल जरूर बदल लिया है। दिलचस्प बात यह है कि नगर निगम में मात्र 27 सीटों पर सिमटने और स्पष्ट बहुमत से कोसों दूर होने के बावजूद भाजपा अभी भी मेयर पद पर काबिज होने की जुगत में लगी है।

साइलेंट प्रोटेस्ट; 3900 से ज्यादा ने नोटा दबाया:वार्ड 31 में सबसे कम 13, वार्ड 21 और 42 में 100 के पार नोटा का आंकड़ा

नगर निगम चुनाव 2026 के नतीजों में जनता ने केवल प्रत्याशियों की हार-जीत का फैसला ही नहीं सुनाया, बल्कि राजनीतिक दलों के सामने अपने कड़े तेवर भी साफ कर दिए हैं। 80 में से लगभग 65 वार्डों के परिणाम के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चला कि 3,900 से अधिक मतदाताओं ने किसी भी प्रत्याशी को योग्य न मानते हुए नोटा (नन ऑफ द एबव) का बटन दबाया है। वार्ड 42 में सबसे ज्यादा 106, वार्ड 35 में 103 और वार्ड 21 में 101 मतदाताओं ने नोटा का विकल्प चुना है। वार्ड 72 में 98, वार्ड 40 में 92, वार्ड 36 व 79 में 90-90 और वार्ड 50 में 87 मतदाताओं ने सभी उम्मीदवारों को नकार दिया। सबसे कम नोटा का प्रयोग वार्ड 31 में देखा गया, जहां केवल 13 मतदाताओं ने इसे चुना। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि कई वार्डों में प्रत्याशियों के प्रति स्थानीय असंतोष और बुनियादी नागरिक सुविधाओं की अनदेखी के चलते वोटर्स ने नोटा की राह चुनी। वार्ड वार नोटा की स्थिति हाई-नोटा जोन (80 से ऊपर वोट) : वार्ड 72 (98), वार्ड 40 (92), वार्ड 36 व 79 (90-90), वार्ड 50 (87), वार्ड 69 (85), वार्ड 45 (80) और वार्ड 48 (86) में मतदाताओं का असंतोष छलका। लो-नोटा जोन (30 से कम वोट) : वार्ड 31 में सबसे कम 13 नोटा वोट पड़े। वार्ड 26 (20), वार्ड 60 (23), वार्ड 10 (26), वार्ड 02, 09 व 32 (29-29) में भी नोटा का ग्राफ कम रहा। शतकीय प्रहार : वार्ड 42 (106), वार्ड 35 (103) और वार्ड 21 (101) ऐसे तीन प्रमुख क्षेत्र रहे जहां नोटा के वोट 100 के पार पहुंचे। मायने क्या औसत प्रति वार्ड 60 से अधिक वोटर्स का नोटा चुनना इस बात का संकेत है कि राजनीतिक दलों को अब टिकट वितरण व स्थानीय मुद्दों को अधिक गंभीरता से लेना होगा।

जिले के 690 वार्डों में से भाजपा को 311:जयपुर में कांग्रेस को 13,135 ज्यादा वोट मिले, फिर भी बोर्ड भाजपा का, कारण- नया परिसीमन

जिले की 19 नगर निकायों के चुनाव परिणाम सोमवार को घोषित हो गए। भाजपा ने 690 कुल वार्डों में से 311 वार्ड जीतकर बढ़त बनाई है। कांग्रेस को 255 वार्डों पर संतोष करना पड़ा। भास्कर ने निकाय चुनाव परिणामों का एनालिसिस किया तो वोटों के आंकड़ों की अलग ही तस्वीर सामने आई। पूरे जिले में कांग्रेस को 6 लाख 76 हजार 815 वोट मिले, जबकि भाजपा के खाते में 6 लाख 75 हजार 929 वोट पड़े। यानी कांग्रेस को 886 वोट ज्यादा मिले। वहीं जयपुर में भाजपा को 5 लाख 52 हजार 713 और कांग्रेस को 5 लाख 65 हजार 848 वोट मिले। यानी कांग्रेस को भाजपा से 13,135 वोट ज्यादा मिले। इसके बावजूद 78 वार्ड जीत कर भाजपा बोर्ड बना रही है। इसका कारण वार्ड परिसीमन को माना जा रहा है, जो भाजपा ने दोनों नगर निगमों को एक कर 250 वार्डांे को 150 में बदला था। वोटों में कांग्रेस आगे, सीटों में भाजपा चुनाव का सबसे दिलचस्प आंकड़ा कुल वोटों का है। कांग्रेस को 6,76,815 वोट मिले, जबकि भाजपा को 6,75,929 वोट मिले। यानी कांग्रेस को भाजपा से 8,986 वोट अधिक मिले। ऐसे में सीटों और वोटों के परिणामों में बड़ा अंतर दिखाई देता है। भाजपा ने 56 वार्ड ज्यादा जीते, लेकिन कुल वोटों में कांग्रेस मामूली अंतर से आगे रही। 111 पर निर्दलीयों का कब्जा, 4 लाख से ज्यादा वोट लिए निकाय चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशियों का प्रदर्शन भी महत्वपूर्ण रहा। इन्होंने 4 लाख 22 हजार 985 वोट लेते हुए 111 वार्डों पर जीत हासिल की। इन वार्डांे में भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशी दूसरे और तीसरे नंबर पर रहे। यानी निकाय चुनाव में स्थानीय समीकरण और प्रत्याशी की व्यक्तिगत इमेज पर भी वोट पड़े। आरएलपी ने पहली बार खोला खाता, 5 वार्डों में जीत चौंकाने वाली बात यह भी है कि राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) ने जयपुर जिले के निकाय चुनाव में सेंध लगाई है। पहली बार खाता खोलते हुए एक साथ 5 वार्ड अपने नाम किए हैं। आरएलपी को कुल 15,870 वोट मिले। बगरू, चौमूं, फागी में 1-1 और वाटिका में 2 वार्ड जीते।

भाजपा की फूट बनी कांग्रेस की जीत का आधार:आपस में विवाद के बावजूद वार्डों पर फोकस बनाए रखा

कांग्रेस ने पकड़ी भाजपा की कमजोरी नगर निगम चुनाव के आए नतीजों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। 2009 में जब सीधे मेयर के चुनाव हुए थे तब कांग्रेस के भवानी शंकर शर्मा मेयर चुने गए थे। इसके बाद अब करीब 17 साल के लंबे अंतराल के बाद बीकानेर में एक बार फिर कांग्रेस का मेयर बनने जा रहा है। इस चुनाव में कांग्रेस ने पूर्ण बहुमत हासिल करते हुए 42 सीटों पर शानदार जीत दर्ज की है, जबकि सत्ताधारी दल भाजपा सिर्फ 27 सीटों पर सिमट कर रह गई। इस बंपर जीत के पीछे के कारणों की जब ग्राउंड रिपोर्ट और राजनीतिक विश्लेषकों से पड़ताल की गई, तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। रिसर्च में यह साफ हुआ कि राज्य सरकार की एंटीइनकंबेंसी (सत्ता विरोधी रुझान) और भाजपा के भीतर की भयंकर गुटबाजी ही कांग्रेस की इस बड़ी जीत का मुख्य आधार बनी। चुनाव से पहले टिकट वितरण को लेकर भाजपा में भारी असंतोष और फूट साफ नजर आ रही थी। पार्टी के भीतर टिकटों के बंटवारे को लेकर बगावत इस कदर हावी थी कि कई वार्डों में पार्टी के अपने ही बागी उम्मीदवार मैदान में ताल ठोकते नजर आए। वार्ड 50 का टिकट वितरण का मामला तो राष्ट्रीय स्तर तक चर्चा का विषय बन गया था। इसके विपरीत टिकट वितरण में कुछ ऐसी ही खींचतान कांग्रेस के भीतर भी थी, लेकिन कांग्रेस ने डैमेज कंट्रोल करते हुए अंदरूनी रणनीतिक चालें चलनी शुरू कर दीं। कांग्रेस ने भाजपा की इसी अंदरूनी फूट और गुटबाजी की सटीक नब्ज पकड़ ली थी। पार्टी रणनीतिकारों ने भाजपा द्वारा जारी की गई उम्मीदवारों की सूचियों का गहन परीक्षण किया और यह थाह लिया कि कौन सा उम्मीदवार किस नेता के खेमे से ताल्लुक रखता है। कांग्रेस ने बेहद खामोशी से भाजपा के असंतुष्टधड़ों और दूसरे गुटों को साधना शुरू कर दिया, जिसका फायदा उन्हें सीधा मतदान के दिन मिला। मेयर पद की लालसा और अपनों की ही घेराबंदी राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा की हार का सबसे बड़ा कारण पार्टी के भीतर मौजूद मेयर पद के दावेदारों की आपसी खींचतान रही। टिकट वितरण से लेकर चुनाव प्रचार तक, भाजपा के कई बड़े नेता और मेयर पद के तमाम दावेदार परोक्ष रूप से अपनी ही पार्टी के विरोधी गुट के प्रत्याशियों को हराने में जुटे रहे। हर कोई यह अंदरूनी गणित बैठा रहा कि यदि दूसरा गुट हार जाएगा तो अगला नंबर स्वतः उसका आ जाएगा। बड़े नेताओं की इसी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और भीतरघात ने भाजपा के गढ़ को अंदर से खोखला कर दिया, और कांग्रेस बिना किसी बड़े राज्य स्तरीय राष्ट्रीय चेहरे के भी आसानी से बाजी मार ले गई। दिलचस्प बात यह रही कि भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने के लिए मुख्यमंत्री खुद बीकानेर में रोड शो करने आए और कई बड़े दिग्गज नेताओं ने ताकत झोंकी। इसके उलट, कांग्रेस की तरफ से स्टार प्रचारकों या राज्य स्तर के किसी बड़े पदाधिकारी ने चुनाव प्रचार में विशेष दखल नहीं दिया। कांग्रेस ने इस चुनाव को पूरी तरह स्थानीय स्तर पर लड़ा। स्थानीय स्तर पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं बीडी कल्ला, मदन मेघवाल और यशपाल गहलोत की तिकड़ी ने जिस प्रकार चुनावी प्रबंधन संभाला और एक-एक वार्ड के समीकरण को साधा उसी के दम पर पार्टी ने यह ऐतिहासिक जीत हासिल कर ली।

भाजपा जीत के 7वें आसमान पर:146 में से 78 सीटें जीतीं, लगातार 7वीं बार बोर्ड बनाया, कांग्रेस को 53 सीटें

जयपुर नगर निगम की सत्ता में भाजपा का दबदबा एक बार फिर कायम रहा। सोमवार को घोषित चुनाव परिणामों में भाजपा ने बहुमत का आंकड़ा पार करते हुए लगातार सातवीं बार नगर निगम में अपना बोर्ड बना लिया। 1994 में पहली बार चुनाव हुए थे। यानी​ पिछले 32 साल से भाजपा का ही बोर्ड है। इस बार 150 वार्डों वाले निगम में 146 वार्डों के नतीजे घोषित हुए हैं। इनमें भाजपा ने 78 वार्ड जीतकर बहुमत के लिए जरूरी 76 का आंकड़ा पार कर लिया। कांग्रेस के खाते में 53 और निर्दलीयों के पास 15 वार्ड गए हैं। वार्ड 9, 18, 25 और 34 के परिणाम ईवीएम खराब होने के कारण फिलहाल अटके हुए हैं। इन चार वार्डों के नतीजे आने बाकी हैं, लेकिन इससे बोर्ड बनाने की तस्वीर पर कोई असर नहीं पड़ेगा। भाजपा घोषित परिणामों में ही स्पष्ट बहुमत हासिल कर चुकी है। मेयर बदला, लेकिन बोर्ड नहीं जयपुर नगर निगम की राजनीति में भाजपा की पकड़ का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले सात बोर्ड लगातार उसके खाते में गए हैं। बीच में 2009 में मेयर के सीधे चुनाव हुए थे। तब कांग्रेस से ज्योति खंडेलवाल मेयर बनी थी। लेकिन बोर्ड भाजपा का बना था। तब जयपुर निगम में 77 वार्ड थे। भाजपा के 47, कांग्रेस के 25 और 5 निर्दलीय जीते थे। 2020 में दो निगम बने तो हेरिटेज में कांग्रेस ने निर्दलीयों के साथ बोर्ड बनाया, लेकिन साढ़े तीन साल बाद सरकार बदलते ही भाजपा बोर्ड बन गया। यानी एक बार बोर्ड बना वो भी अधूरा। सांगानेर ने दी सबसे बड़ी ताकत विधानसभा क्षेत्रवार देखें तो भाजपा को सबसे बड़ी बढ़त सांगानेर से मिली। यहां 21 में से 15 वार्ड भाजपा ने जीते। विद्याधर नगर में 12 और मालवीय नगर में 10 वार्ड भाजपा के खाते में आए। हवामहल में 8, झोटवाड़ा में 7 और किशनपोल में 6 वार्ड जीतकर पार्टी ने बोर्ड के लिए जरूरी संख्या जुटाई। कांग्रेस ने आदर्श नगर में 10 और बगरू में 8 वार्ड जीतकर अपनी मजबूती दिखाई। सिविल लाइंस में मुकाबला बराबरी पर रहा।

पूर्व खेल मंत्री चांदना की माताजी का निधन:जयपुर के एसएमएस अस्पताल में इलाज के दौरान ली अंतिम सांस

पूर्व खेल मंत्री अशोक चांदना की माताजी का सोमवार को निधन हो गया। सीने में दर्द की शिकायत के बाद परिजन उन्हें सवाई मानसिंह हॉस्पिटल की इमरजेंसी लेकर पहुंचे, जहां उन्हे डॉक्टरों ने सीपीआर और अन्य ट्रीटमेंट देकर बचाने का प्रयास किया, लेकिन वे बच नहीं सकी। डॉक्टरों के मुताबिक- सोहनी देवी करीब 70 वर्ष की थी और उन्हें पहले से शुगर, बीपी की समस्या थी। परिजनों ने बताया- वे रेगुलर इन बीमारियों का ट्रीटमेंट ले रहे थे और दवाइयां चल रही थी। अचानक सीने में दर्द की शिकायत के बाद बेहोश हो गईं। इसके बाद उन्हें परिजन जयपुर स्थित आवास से सवाई मानसिंह लेकर पहुंचे। यहां डॉक्टरों ने इलाज किया और उन्हे बचाने का खूब प्रयास किया, लेकिन बचा नहीं सके। यूथ कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष भी रहे चांदना आपको बता दें कि अशोक चांदना कांग्रेस के लीडर हैं और वे यूथ कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष रह चुके हैं। वे साल 2013 से 2023 तक दो बार विधानसभा के सदस्य भी निर्वाचत हुए। पिछली गहलोत सरकार में वे खेल मंत्री भी रहे। चांदना ने मंत्री रहते हुए ही प्रदेश के ग्रामीण युवाओं में खेलों को प्रोत्साहन देने के लिए राजस्थान ग्रामीण ओलंपिक की शुरुआत की थी।

उदयपुर के 80 वार्डों में जीत-हार के चौंकाने वाले समीकरण:मिनी पाकिस्तान’ बयान के बीच कांग्रेस के सभी 5 मुस्लिम चेहरे जीते, BJP का एक भी नहीं

उदयपुर के 80 वार्डों के चुनाव नतीजों में जीत-हार के साथ कई ऐसे समीकरण सामने आए, जिन्होंने राजनीतिक दलों को भी चौंका दिया। भाजपा विधायक के ‘मिनी पाकिस्तान’ बयान के बीच कांग्रेस के पांचों मुस्लिम प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की, जबकि भाजपा का एक भी मुस्लिम चेहरा चुनाव नहीं जीत सका। वहीं आपसी झगड़ों और खींचतान के बीच तीन वार्डों के नतीजे भी खास रहे। इन नतीजों ने स्थानीय राजनीति में वोटों के समीकरण और प्रत्याशियों के प्रभाव की नई तस्वीर सामने रखी है। दरअसल, उदयपुर नगर निगम चुनाव के नतीजों में भाजपा ने बहुमत हासिल कर बोर्ड बनाने की स्थिति जरूर बनाई, लेकिन 80 वार्डों के परिणामों में कई ऐसे नतीजे भी सामने आए, जिन्होंने राजनीतिक समीकरणों और स्थानीय पकड़ को लेकर तस्वीर बदल दी। कहीं कांग्रेस के पूरे जोर और मतदान के दिन हुए विवादों के बावजूद भाजपा प्रत्याशी जीत गए तो कहीं भाजपा के मजबूत माने जाने वाले इलाकों में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। सीपीआई-एम ने भी एक वार्ड में जीत दर्ज की जबकि बीएपी खाता खोलने में भी नाकाम रही। कुछ वार्डों में बेहद करीबी मुकाबले हुए तो कई पुराने और चर्चित चेहरों की वापसी हुई। मुस्लिम प्रतिनिधित्व में भी इस बार बड़ा अंतर सामने आया। विवाद के बीच भाजपा की दोनों सीटें निकलीं वार्ड 76 में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला मतदान के दिन तक काफी तनावपूर्ण रहा। कांग्रेस की ओर से ब्लॉक अध्यक्ष कमल डांगी ने अपनी बहू इन्द्रा डांगी को जिताने के लिए रात-दिन जोर लगाया। मतदान के दिन दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच कई बार फर्जी वोटिंग के आरोपों को लेकर बहस और विवाद की स्थिति बनी। इसके बावजूद भाजपा की कविता जोशी ने जीत दर्ज की। कविता जोशी पहले सरपंच रह चुकी हैं। वे भाजपा मंडल अध्यक्ष मुकेश जोशी की पत्नी हैं और खुद भी महिला मोर्चा की जिलाध्यक्ष रह चुकी हैं। वार्ड 80 में भी दिनभर के हंगामे के बीच प्रताप राठौड़ जीते वार्ड 80 में भाजपा के प्रताप सिंह राठौड़ को कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के हंगामे के बीच जीत मिली। कांग्रेस की ओर से पूर्व सरपंच के बेटे योगेश पुष्करण ने पूरी ताकत लगा रखी थी। मतदान के दौरान यहां भी दोनों पक्षों के बीच विवाद और हंगामे की स्थिति बनी रही, लेकिन अंतिम परिणाम भाजपा के प्रताप राठौड़ के पक्ष में रहा। वार्ड 1 में भी भाजपा का जोर काम नहीं आया वार्ड 1 में कांग्रेस प्रत्याशी संजय शर्मा के लिए भी मुकाबला काफी जोरदार रहा। तमाम जोर लगाने के बावजूद भाजपा के दीपक शर्मा को हार का सामना करना पड़ा। दीपक शर्मा के प्रचार के लिए पूर्व मंत्री राजेन्द्र राठौड़ तक ने प्रचार किया था, लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस प्रत्याशी सरपंच रहे संजय शर्मा जीत दर्ज करने में सफल रहे। मिनी पाकिस्तान बयान वाले इलाकों में भाजपा को झटका भाजपा के उदयपुर शहर विधायक ताराचंद जैन का आयड़ और खांजीपीर इलाके को लेकर दिया गया मिनी पाकिस्तान का भारी बयान इन इलाकों में भाजपा पर भारी पड़ा। आयड़ और खांजीपीर दोनों इलाकों में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। मतदान के दिन शहर विधायक ताराचंद जैन का कांग्रेस प्रत्याशी हितांशी शर्मा और उनके पिता के.के. शर्मा ने विरोध भी किया। विरोध के बाद विधायक बूथ तक नहीं जा पाए। सीपीआई के वसीटा जीते भाजपा के मजबूत माने जाने वाले इलाकों के बीच सीपीआई-एम ने जीत दर्ज की। वार्ड 32 से राजेन्द्र वसीटा ने जीत दर्ज की। पार्टी ने अपने परंपरागत वोट के भरोसे शहर में अपनी मौजूदगी कायम रखी है। राजेन्द्र वसीटा खुद पहले पार्षद रह चुके हैं। रोत के प्रचार के बावजूद बीएपी का खाता नहीं खुला, नोटा से भी कम वोट राजकुमार रोत के प्रचार के बावजूद बीएपी शहर में अपना खाता नहीं खोल पाई। वार्ड नंबर 13 में 77 लोगों ने नोटा का बटन दबाया। वहीं बीएपी प्रत्याशी संतोष कटारा को नोटा से भी कम 61 वोट मिले। इस वार्ड में भाजपा की रतन बाई ने जीत दर्ज की। 100 से कम वोटों से जीते 7 प्रत्याशी 80 वार्डों के परिणामों में 7 ऐसे प्रत्याशी रहे, जिन्होंने 100 से भी कम वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। इनमें स्नेहलता टांक, आकाश वागरेचा, कुलदीप मेहता, राहुल माली, मनोज साहू, लोकेश साहू और महेन्द्र सिंह के नाम शामिल हैं। इन वार्डों में जीत का अंतर बेहद कम रहा और अंतिम परिणाम तक मुकाबला कड़ा बना रहा। विधायक के गृह इलाके में भी भाजपा प्रत्याशी नहीं जीती, बागी मेहता भारी! ग्रामीण विधायक फूलसिंह मीणा के खुद के गृह इलाके के वार्ड में भाजपा प्रत्याशी को हार का सामना करना पड़ा। पुरोहितों की मादड़ी के वार्ड 61 से भाजपा से बागी होकर मैदान में उतरे कमलेश मेहता की पत्नी खुशबु ने सीट पर अपना कब्जा कायम रखा। कमलेश मेहता पहले इस वार्ड से पार्षद रह चुके हैं। इस चुनाव में भाजपा दूसरे नंबर पर रही। विधायक के खुद के वार्ड में भी कमलेश मेहता की वर्किंग काम आई और विधायक अपने प्रत्याशी सुषमा चौहान को जीत नहीं दिला पाए। ओल्ड सिटी में भाजपा की पकड़ कमजोर दिखी ओल्ड सिटी के परंपरागत वार्डों में इस बार भाजपा को अपेक्षाकृत कम वार्ड मिले। वार्ड 17 से पूनम राठौड़ और वार्ड 15 से प्रतीक नागर की जीत ने इन इलाकों में भाजपा की कमजोर पकड़ को सामने ला दिया। ये वार्ड भाजपा के मजबूत और परंपरागत वोटर्स वाले माने जाते हैं, ऐसे में यहां पार्टी के अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन को अहम माना गया। साजिद खान की सबसे बड़ी जीत, आकाश वागरेचा की सबसे छोटी इस चुनाव में सबसे बड़ी जीत साजिद खान के नाम रही। उन्होंने 2790 वोटों से जीत दर्ज की। वहीं सबसे कम अंतर से जीतने वाले प्रत्याशी आकाश वागरेचा रहे, जिन्होंने महज 50 वोटों के अंतर से चुनाव जीता। वागरेचा की जीत शहरभर में चर्चा में रही। कांग्रेस के रवि सुखवाल ने उन्हें कड़ी टक्कर दी और मुकाबले ने पार्टी की चिंता बढ़ा रखी थी। कांग्रेस जिलाध्यक्ष पत्नी को जिताने में रहे सफल कांग्रेस जिलाध्यक्ष फतेह सिंह राठौड़ अपनी पत्नी पूनम कुंवर को चुनाव जिताने में सफल रहे। फतेह सिंह राठौड़ इससे पहले खुद पार्षद का चुनाव हार चुके हैं, लेकिन इस बार भाजपा के वार्ड में पत्नी पूनम कुंवर को जीत दिलाने में सफल रहे। बड़े और चर्चित चेहरों पर दांव काम आया इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस ने जिन चर्चित या बड़े चेहरों पर दांव लगाया, उनमें से कोई भी चुनाव नहीं हारा। भाजपा में महेन्द्र सिंह और आकाश वागरेचा की जीत से पार्टी की लाज बची। वहीं कांग्रेस में भी शंकर चंदेल, अरुण टांक और पूनम की जीत से पार्टी की साख बची। पुराने पार्षदों की वापसी भी हुई इस चुनाव में कुछ पुराने चेहरों की वापसी भी हुई। भाजपा के पुराने पार्षद आशीष कोठारी को इस बार वार्ड बदलकर मैदान में उतारा गया था। इसके बावजूद वे जीतने में सफल रहे। कांग्रेस के पहले पार्षद रह चुके लक्ष्मीनारायण मेघवाल की भी वापसी हुई। इसके अलावा कांग्रेस के अरूण टांक, हितांशी शर्मा और शंकर चंदेल पहले पार्षद रह चुके हैं। भाजपा के महेन्द्र सिंह शेखावत, अतुल चंड़ालिया, पारस सिंघवी, विजय आहूजा, प्रमोद सामर और अमिता गौड़ भी पहले पार्षद रह चुके हैं। माकपा के राजेन्द्र वसीटा खुद पहले पार्षद रहे हैं। निर्दलीय प्रत्याशी खुशबु मेहता के पति कमलेश मेहता भी पहले पार्षद रह चुके हैं। इस तरह इस चुनाव में कई अनुभवी चेहरों ने दोबारा एंट्री की। ऐन मौके पर टिकट, युवा चेहरे ने जीता चुनाव कांग्रेस ने ऐन मौके पर वार्ड नंबर 30 से रोहित मेघवाल को टिकट दिया। रोहित मेघवाल युवा और फ्रेशर चेहरा हैं। उन्होंने चुनाव जीतकर निगम में अपनी जगह बनाई। कांग्रेस के पांच मुस्लिम चेहरे जीते, भाजपा का एक भी नहीं 80 वार्डों के इस चुनाव में कुल 5 मुस्लिम चेहरे पार्षद बने हैं और ये सभी कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशी हैं। भाजपा का एक भी मुस्लिम प्रत्याशी जीत दर्ज नहीं कर पाया। कांग्रेस के हिदायतुल्ला, मीना बानो, हीना कौसर बानो, साजिद खान और रूखसार खान चुनाव जीते हैं। इनमें हीना मुस्तफा शेख की पत्नी हैं, जबकि रूखसार पूर्व मोहसिनी की पत्नी हैं। भाजपा ने इस बार दो मुस्लिम प्रत्याशियों को उतारा था।

BJP-कांग्रेस के वोट शेयर में 1% से कम अंतर:आरएलपी-आप सहित 5 पार्टियों को नोटा से कम वोट, भाजपा ने कांग्रेस से 566 वार्ड ज्यादा जीते

राजस्थान के 309 शहरी निकायों के चुनावों में बीजेपी को कांग्रेस से 99615 वोट ज्यादा मिले हैं। कुल 1.06 करोड़ वोटों में से बीजेपी को 37.35 लाख, कांग्रेस को 36.35 लाख और निर्दलीयों को 29.06 लाख वोट मिले हैं। पांच अन्य पार्टियों को नोटा से कम वोट मिले हैं। नोटा को 1.09 लाख वोट मिले हैं। वहीं, हनुमान बेनीवाल की पार्टी आरएलपी को 1 लाख 277 वोट मिले हैं। आम आदमी पार्टी (आप) को 49829, बीएपी को 14150, सीपीएम को 34,170 और बसपा को 30179 वोट मिले हैं। बीजेपी का वोट शेयर 35.18 फीसदी, कांग्रेस को 34.24 फीसदी बीजेपी और कांग्रेस के वोट शेयर में एक फीसदी से भी कम का अंतर है। बीजेपी को कांग्रेस की तुलना में 0.94 फीसदी वोट ज्यादा मिले हैं। बीजेपी का वोट शेयर 35.18 फीसदी, कांग्रेस का 34.24 फीसदी और निर्दलीयों का 27.38 फीसदी वोट शेयर है। 11 निकायों में कांग्रेस, बीजेपी को बराबर सीटें 60 निकायों में बीजेपी को स्पष्ट बहुमत मिला है। 11 निकायों में कांग्रेस और बीजेपी को बराबर सीटें मिली हैं। यहां पर दल बदल या निर्दलीयों से ही बोर्ड बन सकता है। 100 वार्ड वाले जोधपुर नगर निगम में कांग्रेस-बीजेपी को 44-44 वार्डों में जीत मिली है, यहां 10 निर्दलीय हैं। पीसांगन,अंता,कापरेन, राजलदेसर, बसेड़ी, सूरतगढ़, मारवाड़ जंक्शन, धरियावद, खाटूश्यामजी में कांग्रेस और बीजेपी को बराबर सीटें मिली हैं। बीजेपी ने कांग्रेस से 566 वार्ड ज्यादा जीते बीजेपी और कांग्रेस के बीच वोट शेयर का अंतर भले ही एक फीसदी से कम रहा हो। लेकिन इस मामूली अंतर से रिजल्ट में बड़ा अंतर आया है। प्रदेश के 10244 वार्डों में से 10235 वार्डों के रिजल्ट घोषित हुए, 9 वार्डों पर रिपोलिंग होगी। बीजेपी ने कांग्रेस से 566 वार्ड ज्यादा जीते हैं। कांग्रेस ने 3613, बीजेपी ने 4179 वार्ड जीते हैं जबकि निर्दलीयों ने 2273 वार्डों में जीत दर्ज की है। ………………………. ये खबर भी पढ़ें… 1. रिजल्ट में ‘काकाजी’ की एंट्री का असर:जनता ने भाजपा-कांग्रेस को डराकर जिताया; 140+ निकायों में निर्दलीय खोलेंगे सत्ता का ताला राजस्थान के निकाय चुनाव के नतीजों का एक वाक्य में विश्लेषण करें तो भाजपा जीती है, लेकिन कांग्रेस भी बुरी तरह से नहीं हारी है। निकाय चुनाव में ‘काकाजी’ की एंट्री का असर भी दिख रहा है। वैसे चुनाव संख्या के हिसाब से भाजपा 309 निकायों में से 163 में जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर आगे है। कांग्रेस 103 पर है, लेकिन ये आंकड़े अधूरी सच्चाई हैं। (पूरी खबर पढ़ें) 2. पूर्व सीएम गहलोत और केंद्रीय मंत्री शेखावत अपने वार्ड हारे:पायलट के क्षेत्र में जीती कांग्रेस; राजस्थान निकाय चुनाव में पहली बार ‘आप’ का बोर्ड 3. राजस्थान- 10 में से 4 नगर निगमों में निर्दलीय किंगमेकर:पाली-अजमेर के रिजल्ट ने चौंकाया; बीकानेर में कांग्रेस, भीलवाड़ा-उदयपुर में भाजपा बनाएगी मेयर 4. भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशियों को 1-1 वोट मिला:सीकर में कांग्रेस-निर्दलीय समर्थक भिड़े, पत्थर फेंके; वसुंधरा राजे के गढ़ झालावाड़ में कांग्रेस जीती 5. जयपुर में सुनील-पुनीत-विमल मेयर की रेस में:उदयपुर में कटारिया के रिश्तेदार, कोटा में स्पीकर की पसंद पर लग सकती है मुहर, जानिए निगमों में मेयर के प्रमुख दावेदार 6. भाजपा–कांग्रेस से टिकट लाए, परिवार के वोट भी नहीं मिले:कांग्रेस में पिता–पुत्र और पति–पत्नी की जोड़ी दहाई भी नहीं छू पाई, भाजपा प्रत्याशी को मिला महज एक वोट 7.जयपुर, जोधपुर, कोटा में मेयर-डिप्टी मेयर के चुनाव स्थगित:राज्य निर्वाचन आयोग नए सिरे से जारी करेगा कार्यक्रम, EVM खराबी से रिजल्ट अटका

उदयपुर में दिग्गजों के साथ पीएचडीधारी और सीए भी जीते:भाजपा के ऑटो ड्राइवर मिथुन दा ने भी जीत की हासिल, करोड़पति उम्मीदवारों ने भी बाजी मारी

उदयपुर नगर निगम के 80 वार्डों में भाजपा ने 53 वार्डों में जीत दर्ज कर बहुमत हासिल किया है। कांग्रेस को 23 वार्ड मिले, जबकि एक वार्ड में माकपा और तीन वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशी विजयी रहे। वार्ड 54 में भाजपा के राजेंद्र गखरेजा ने निर्दलीय देवेंद्र माली को हराया। राजेंद्र ऑटो ड्राइवर है और उस इलाके में उनको मिथुन दा के नाम से जाना जाता है। उनके वार्ड में जनजाति मंत्री बाबूलाल खराड़ी भी गए थे और उनकी सबको चिंता थी, लेकिन वे चुनावी मैच जीत गए। इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के कई बड़े नेता चुनाव जीते हैं। कई करोड़पति उम्मीदवारों ने भी बाजी मारी है तो भाजपा के पूर्व डिप्टी मेयर महेंद्र सिंह शेखावत 51 और आकाश वागरेचा 50 वोट से ही जीत पाए। पीएचडी धारी कांग्रेस की डॉ. हितांशी शर्मा, डॉ. पूनम राठौड़ और भाजपा की डॉ. कविता जोशी, डॉ. पंकज बोराणा चुनाव जीते हैं, जबकि भाजपा के सीए आशीष कोठारी, कांग्रेस की MBBS डॉक्टर खुशी गमेती भी जीती है। इसके अलावा भाजपा और कांग्रेस के युवा संगठन और छात्र नेता भी चुनाव जीतकर नगर निगम में पहुंचे है। स्टूडेंट लीडर महेंद्र सिंह शेखावत, डॉ. पंकज बोराणा, प्रमोद सामर, पारस सिंघवी, किशन भील, हर्षवर्धन केलावत जैस छात्र नेता शामिल है। भाजपा के मंडल अध्यक्ष प्रताप सिंह राठौड़, विजय आहूजा, महेशपुरी गोस्वामी तो कांग्रेस के ब्लॉक अध्यक्ष शंकर चंदेल ने भी बाजी मारी। वहीं कांग्रेस से संगठन महामंत्री और पिछले चुनाव में मेयर पद के उम्मीदवार अरुण टांक भी जीत गए है। उदयपुर नगर निगम के 80 ही पार्षदों का प्रोफाइल देखें उदयपुर नगर निगम चुनाव से जुड़ी खबरें पढ़े…. उदयपुर में सातवीं बार बनेगा भाजपा का बोर्ड:53 सीटों पर बीजेपी, 23 में कांग्रेस और 4 निर्दलीय-माकपा जीते, जानिए कौन-कितने वोट से जीता कानोड, भींडर-मावली पालिका में कांग्रेस का बोर्ड बनना तय:फतहनगर और वल्लभनगर में बीजेपी को बहुमत, उदयपुर में 5 नगर पालिकाओं के रिजल्ट उदयपुर में मेयर-डिप्टी मेयर की कुर्सी को लेकर लॉबिंग तेज:प्रमोद सामर और दिनेश भट्ट प्रमुख दावेदार; सिंघवी-चंडालिया भी लगा रहे पूरा जोर